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संघर्ष से शिखर तक :- डॉ. रीना मिश्रा की प्रेरक यात्रा बनी महिलाओं के लिए मिसाल



जिम्मेदारियों, सामाजिक चुनौतियों और अथक मेहनत के बीच हासिल की डॉक्टरेट की उपाधि

मेदिनीनगर:
कहते हैं कि शिक्षा केवल नौकरी या डिग्री पाने का माध्यम नहीं होती, बल्कि यह इंसान के व्यक्तित्व को गढ़ने और समाज को नई दिशा देने की ताकत रखती है। कुछ लोग अपने संघर्ष और समर्पण से इस सोच को जीवंत कर देते हैं। ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी है रीना मिश्रा की, जिन्होंने जीवन की तमाम चुनौतियों के बीच अपने सपनों को न केवल जिंदा रखा, बल्कि उन्हें साकार भी किया। आज वही रीना मिश्रा “डॉ. रीना मिश्रा” के नाम से जानी जा रही हैं।

रांची के शैक्षणिक और सांस्कृतिक माहौल में पली-बढ़ी रीना मिश्रा ने शुरू से ही शिक्षा को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया था। पढ़ाई के प्रति उनका समर्पण इतना गहरा था कि उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने वर्ष 2007-08 में वीमेंस कॉलेज, रांची में गेस्ट सहायक प्रोफेसर के रूप में अपने शिक्षण जीवन की शुरुआत की। विद्यार्थियों को ज्ञान देने का यह सफर आगे भी निरंतर जारी रहा।

विवाह के बाद जहां अधिकांश महिलाओं के सामने परिवार और करियर के बीच संतुलन बनाने की चुनौती खड़ी हो जाती है, वहीं रीना मिश्रा ने इस कठिन राह को अपनी ताकत बना लिया। वर्ष 2016 से 2023 तक उन्होंने जीएलए कॉलेज, डालटनगंज में गेस्ट सहायक प्रोफेसर के रूप में विद्यार्थियों का मार्गदर्शन किया। इस दौरान उन्होंने यह साबित कर दिया कि यदि इच्छाशक्ति मजबूत हो, तो जिम्मेदारियां कभी सपनों की राह नहीं रोक सकतीं।

उनकी मेहनत का अगला पड़ाव वर्ष 2023 में आया, जब उन्होंने हाई स्कूल प्रतियोगिता परीक्षा उत्तीर्ण कर सरकारी विद्यालय में शिक्षक की जिम्मेदारी संभाली। बच्चों को पढ़ाते हुए उन्होंने केवल पाठ्यक्रम तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि विद्यार्थियों में आत्मविश्वास जगाने और बड़े सपने देखने की प्रेरणा भी दी।

इसी दौरान उन्होंने अपने जीवन के सबसे चुनौतीपूर्ण लक्ष्य—पीएचडी—को पूरा करने का संकल्प लिया। नौकरी, परिवार और शोध कार्य के बीच संतुलन बनाना उनके लिए किसी तपस्या से कम नहीं था। अनगिनत रातों की मेहनत, धैर्य और दृढ़ संकल्प के बल पर आखिरकार उन्होंने डॉक्टरेट की उपाधि हासिल कर ली। उनकी यह उपलब्धि केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि उन तमाम महिलाओं के लिए उम्मीद की किरण है जो परिस्थितियों के कारण अपने सपनों को अधूरा छोड़ देती हैं।

रीना मिश्रा की इस सफलता के पीछे उनके परिवार से मिले संस्कार और शिक्षा का भी अहम योगदान रहा। गढ़वा जिले के बलियारी गांव से संबंध रखने वाले उनके पिता स्वर्गीय श्री राम अगस्त दुबे स्वयं एक शिक्षाविद् थे और गुमला कॉलेज में साइंस प्रोफेसर के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके थे। घर का शैक्षणिक वातावरण ही रीना के व्यक्तित्व की मजबूत नींव बना।

उनका विवाह पलामू जिले के पंजरिकला पंचायत अंतर्गत अमवा गांव में हुआ। उनके पति संजय कुमार मिश्रा, जो पेयजल एवं स्वच्छता विभाग में डीपीओ पद पर कार्यरत रह चुके हैं और वर्तमान में हेल्थ फार्मा कंपनी का संचालन कर रहे हैं, ने हर कदम पर उनका साथ दिया। यही सहयोग उनकी सफलता की सबसे बड़ी ताकत बना।

आज डॉ. रीना मिश्रा केवल एक शिक्षिका या शोधकर्ता नहीं हैं, बल्कि संघर्ष, आत्मविश्वास और नारी शक्ति की सशक्त पहचान बन चुकी हैं। उनकी कहानी यह संदेश देती है कि सपने किसी उम्र, परिस्थिति या सीमाओं के मोहताज नहीं होते। यदि इरादे मजबूत हों, तो गांव की पगडंडियों से निकलकर भी सफलता के शिखर तक पहुंचा जा सकता है।

मजबूत निष्कर्ष -

डॉ. रीना मिश्रा की यात्रा उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा है जो जीवन की कठिनाइयों के बीच अपने सपनों को बचाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। उनका संघर्ष यह साबित करता है कि शिक्षा केवल जीवन बदलती ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए उम्मीद और प्रेरणा का नया रास्ता भी तैयार करती है।

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