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राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस नवयौवन को प्राप्त करेगी!

 कांग्रेस स्थापना दिवस-28 दिसंबर-पर विशेष
- हृदयानंद मिश्र(अधिवक्ता)

किश्त-एक

2014 में नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद अपनी सत्ता को स्थायी बनाने की जुगत में लग गए थे।उनका सही आकलन था कि क्षेत्रीय क्षत्रप और पार्टियां उनको चुनौती पेश नहीं कर पाएंगी,क्योंकि क्षेत्रीय पार्टियां व्यक्ति विशेष के करिश्मे और चमत्कार पर निर्भर होती हैं।अधिकांश क्षेत्रीय पार्टियां व्यक्ति विशेष के निजी पारिवारिक हितों,आकांक्षाओं और स्वार्थपूर्ति की साधन मात्र होती हैं।त्रासदी यह भी थी कि 2014 में कांग्रेस अपनी लोकप्रियता के निम्नतम बिन्दु पर थी,उसे महज 44 सीटें मिली थीं।अपनी लोकप्रियता से बौराए मोदी कांग्रेस मुक्त भारत का सपना देखने लगे और सोनिया गांधी को जर्सी गाय और राहुल गांधी को 'पप्पू'साबित करने में जुट गए।भाजपा का मीडिया सेल अपने व्हॉट्स यूनिवर्सिटी के शोधों(?) के जरिए एक हद तक सफल होता भी दिखा।

लेकिन,2022 में अपनी 'भारत छोड़ो यात्रा' के बाद राहुल गांधी एक नए अवतार में समसामयिक इतिहास को प्रभावित करते दीख रहे हैं।आज,संसद में विपक्ष इतिहास में सबसे मजबूत स्थिति में है।वैश्विक परिदृश्य में नरेन्द्र मोदी अपनी प्रासंगिकता खोते जा रहे हैं,भारतीय उपमहाद्वीप में भारत बड़े भाई की हैसियत गंवाता जा रहा है, राष्ट्रीय परिदृश्य में 'लोकतंत्र चोरी' के सबूत सामने आ रहे हैं।तथाकथित हिन्दूवाद,बहुसंख्यकवाद की आड़ में तानाशाही कायम करने की कोशिशें विफल होती दिख रही हैं।वस्तुत:,राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ,भाजपा और मोदी की इतिहास की समझ अपर्याप्त है।

राहुल गांधी अपने कंधों पर सिर्फ नेहरू-गांधी परिवार की विरासत ही नहीं, कांग्रेस का ऐतिहासिक दायित्व भी साथ लेकर चल रहे हैं।भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की कहानी केवल एक राजनीतिक दल की कहानी नहीं है,बल्कि यह भारत के आधुनिक इतिहास की आत्मकथा है।यह कहानी संघर्ष की है,त्याग की है और उस विश्वास की है कि एक शोषित, पीड़ित जनता की सामूहिक,संगठित जनशक्ति अपने भाग्य को स्वयं लिख सकती है।कांग्रेस को समझे बिना भारत की लोकतांत्रिक यात्रा को समझना कठिन ही नहीं नामुमकिन है।

आरएसएस,भाजपा और मोदी इतिहास को इस प्रकार तोड़ते-मरोड़ते और अपने अनुरूप पेश करने की कोशिश करते रहे हैं कि कांग्रेस की स्थापना की पहल एक अंग्रेज प्रशासक ए ओ ह्यूम ने की थी।इसलिए,कांग्रेस पर अंग्रेजियत या फिर विदेशी संस्कृति हावी रही है।लेकिन,वह भूल जाते हैं कि ह्यूम की पदस्थापना इटावा के प्रशासक के रूप में सन् 1856 ई में इतिहास के एक ऐसे दौर में हुई थी,जब 1857 की क्रान्ति दस्तक दे रही थी और ह्यूम ने यह सही आकलन कर लिया कि 1857 की क्रान्ति को दबाना अगर संभव हो पाया,तो सिर्फ इसलिए कि भारत की सामाजिक संरचना में राजतंत्र की बुनियाद हिल चुकी थी,जड़ें कमजोर हो चुकी थीं।लेकिन,उसी दौर में आमजनों की आकांक्षाएं और अपेक्षाएं परवान चढ़ रही थी,जिसकी एक तरफ अभिव्यक्ति बंगाल में बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय अपने गीत 'वंदेमातरम्' की ओर से कर रहे थे,तो दूसरी ओर हिन्दी के नाटककार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र बलिया के ददरी मेले में भारतेन्दु कला मंच पर सत्य हरिश्चन्द्र नाटक खेलने के साथ स्वदेशी का पाठ पढ़ाया और ननकिलाट (लांगक्लॉथ का अपभ्रंश) और मारकीन(अमरीकन कपड़े का अपभ्रंश) के बहिष्कार का नारा दे रहे थे।ह्यूम अपने दृष्टिकोण में सर्वथा स्पष्ट थे कि भारत में ब्रिटिश हुकूमत के सहयोग और समर्थन से ही एक संगठन बने,जिसे भारतीयों की आशाओं, आकांक्षाओं और अपेक्षाओं की बेहतर समझ हो।

इसी संदर्भ में 28 दिसंबर,1885 को, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना गोपालदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज, मुंबई में हुई,जिसमें 72 प्रतिनिधि उपस्थित थे।ह्यूम ने महासचिव के रूप में कार्यभार संभाला,और व्योमेश चन्द्र बनर्जी को अध्यक्ष चुना गया था।अन्य प्रमुख प्रतिनिधियों में दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी,बदरूद्दीन तैयबजी, फिरोजशाह मेहता,एस रामास्वामी मुदलियार,एस सुब्रमण्यम अय्यर और रमेश चन्द्र दत्त शामिल थे।

1885 से 1905 के बीच,कांग्रेस ने अपने अधिवेशनों में कई प्रस्ताव पारित किए।इन प्रस्तावों के माध्यम से कांग्रेस ने नागरिक अधिकारों,प्रशासनिक, संवैधानिक और आर्थिक नीतियों से संबंधित कई मांगें रखीं थीं।इन नीतियों पर पारित प्रस्तावों को देखने से कांग्रेस के कार्यक्रमों की दिशा का अंदाजा लग जाता है।

क)नागरिक अधिकार:कांग्रेस ने भाषण और प्रेस की स्वतंत्रता,जुलूस निकालने, सभाएं आयोजित करने के अधिकार और इसी तरह के अन्य अधिकारों के महत्व को समझा।

ख)प्रशासनिक:कांग्रेस ने सरकार से कुछ प्रशासनिक खामियों को दूर करने और जन कल्याणकारी उपाय चलाने का आग्रह किया।उन्होंने सरकारी सेवाओं में भारतीयों की नियुक्ति पर जोर दिया। किसानों की राहत के लिए कृषि बैंक खोलने के विशेष प्रस्ताव रखे।कांग्रेस ने सरकारी भेदभावपूर्ण कानूनों के खिलाफ भी विरोध जताया।

ग)संवैधानिक:कांग्रेस द्वारा संवैधानिक विनम्र मांगें थीं:विधान परिषदों की शक्ति बढ़ाना;निर्वाचित भारतीय प्रतिनिधियों को शामिल करना।

घ)आर्थिक:आर्थिक क्षेत्र में,कांग्रेस ने ब्रिटिश सरकार की आर्थिक नीतियों को संपत्ति की बढ़ती कीमतों और अन्य आर्थिक समस्याओं के लिए जिम्मेदार ठहराया,जिनसे भारतीय जनता प्रभावित हुई।कांग्रेस ने देश के आर्थिक सुधार के लिए कुछ विशिष्ट सुझाव भी दिए।इनमें आधुनिक उद्योगों की स्थापना, सार्वजनिक सेवाओं का भारतीयकरण आदि शामिल थे।

लेकिन,सच यह भी है कि ब्रिटिश हुकूमत कांग्रेस की अनुशंसाओं और सुझावों को बहुत गंभीरता से नहीं लेती थी।नतीजा,दादाभाई नौरोजी,गोपालकृष्ण गोखले और फिरोज शाह मेहता जैसे महानुभावों के नरमपंथी रवैये के बावजूद लाला लाजपत राय,लोकमान्य बालगंगाधर तिलक और विपिन चन्द्र पाल जैसे गरमपंथियों की लोकप्रियता और जन-स्वीकार्यता लगातार बढ़ रही थी।

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