पलामू। रामपुर गोलीकांड मामले में लंबे समय से फरार चल रहे और पुलिस की तलाश में शामिल मंटू सिंह ने मंगलवार को न्यायालय में आत्मसमर्पण कर दिया। इस घटनाक्रम के बाद बहुचर्चित रामपुर कांड एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। पुलिस पहले ही इस मामले में कुछ आरोपियों को गिरफ्तार कर चुकी है और अब मंटू सिंह के सरेंडर को जांच में महत्वपूर्ण कड़ी माना जा रहा है।
गौरतलब है कि 23 मई को चैनपुर थाना क्षेत्र के रामपुर गांव में जमीन विवाद को लेकर दो पक्षों के बीच हिंसक झड़प हुई थी। विवाद के दौरान हुई गोलीबारी में सत्येंद्र चौधरी की मौत हो गई थी, जबकि कई अन्य लोग घायल हुए थे। घटना के बाद पूरे इलाके में तनाव का माहौल बन गया था और प्रशासन को अतिरिक्त पुलिस बल तैनात करना पड़ा था।
मृतक पक्ष के बयान पर 17 नामजद और 25 अज्ञात समेत कुल 42 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन ने क्षेत्र में निषेधाज्ञा भी लागू की थी ताकि कानून-व्यवस्था बनी रहे और किसी भी अप्रिय स्थिति को रोका जा सके।
मंटू सिंह के सरेंडर के बाद अब जांच को लेकर एक महत्वपूर्ण सवाल भी खड़ा हो गया है। क्या कार्रवाई केवल हत्या और गोलीबारी के आरोपियों तक सीमित रहेगी, या फिर उस जमीन विवाद की भी गहराई से जांच होगी जिसे इस पूरे संघर्ष की जड़ बताया जा रहा है?
स्थानीय स्तर पर लगातार यह चर्चा होती रही है कि घटना के पीछे भूमि स्वामित्व और कब्जे का विवाद भी एक बड़ा कारण था। ऐसे में केवल आपराधिक मामले की जांच से दोषियों की जिम्मेदारी तय हो सकती है, लेकिन स्थायी समाधान के लिए यह भी आवश्यक होगा कि विवादित जमीन की वास्तविक स्थिति, राजस्व अभिलेख और स्वामित्व संबंधी तथ्यों की निष्पक्ष जांच हो।
अब लोगों की नजर केवल पुलिस की अगली कार्रवाई पर नहीं, बल्कि इस बात पर भी है कि प्रशासन जमीन विवाद के पहलू को किस गंभीरता से लेता है। क्योंकि रामपुर में स्थायी शांति तभी संभव है, जब हत्या मामले में न्याय के साथ-साथ विवाद की मूल वजह पर भी स्पष्ट और पारदर्शी निर्णय सामने आए।
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