नई दिल्ली। विरासत में मिली कृषि भूमि की बिक्री को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 22 के तहत मिलने वाला 'पहले खरीदने का अधिकार' (Right of Pre-emption) कृषि भूमि पर भी लागू होगा।
अदालत के अनुसार, यदि किसी क्लास-1 उत्तराधिकारी—जैसे बेटा, बेटी, पत्नी या मां—को विरासत में मिली कृषि भूमि का अपना हिस्सा किसी बाहरी व्यक्ति को बेचना है, तो उसे सबसे पहले परिवार के अन्य क्लास-1 उत्तराधिकारियों को उसे खरीदने का अवसर देना होगा। यदि परिवार का कोई पात्र सदस्य उस हिस्से को खरीदने की इच्छा जताता है, तो जमीन सीधे किसी बाहरी व्यक्ति को नहीं बेची जा सकेगी।
यह फैसला महिंदर एवं अन्य बनाम पूरन सिंह मामले में जस्टिस संजय करोल और एन. कोटीश्वर सिंह की पीठ ने सुनाया। न्यायालय ने कहा कि धारा 22 के तहत दिया गया यह अधिकार सामान्य प्री-एम्प्शन कानून नहीं, बल्कि उत्तराधिकार से जुड़ा एक विशेष वैधानिक अधिकार है। इसका उद्देश्य विरासत में मिली पारिवारिक संपत्ति को परिवार के दायरे में सुरक्षित रखना है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी स्पष्ट किया कि इस अधिकार की तुलना पंजाब प्री-एम्प्शन एक्ट से नहीं की जा सकती। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत यह सुविधा केवल क्लास-1 उत्तराधिकारियों को प्राप्त है और इसका लाभ सह-स्वामियों या ऐसे अन्य व्यक्तियों को नहीं मिलेगा जिनका उत्तराधिकार से कोई संबंध नहीं है।
इस फैसले के बाद विरासत में मिली कृषि भूमि की बिक्री से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण कानूनी बदलाव देखने को मिल सकते हैं। अब ऐसी भूमि बेचने से पहले परिवार के अन्य पात्र उत्तराधिकारियों को प्राथमिकता देना कानूनी रूप से अनिवार्य होगा। इससे पारिवारिक संपत्ति के बाहरी हाथों में जाने की संभावना कम होगी और उत्तराधिकारियों के अधिकारों को अधिक सुरक्षा मिलेगी।
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