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बशीर बद्र शायरी का बादशाह और हमारी मरती हुई साहित्यिक चेतना -हृदयानंद मिश्र, एडवोकेट

जब कोई साधारण व्यक्ति दुनिया से जाता है तो उसका परिवार रोता है। जब कोई बड़ा नेता जाता है तो उसके समर्थक रोते हैं। लेकिन जब कोई महान साहित्यकार जाता है तो पूरी सभ्यता को रोना चाहिए, क्योंकि उसके साथ केवल एक व्यक्ति नहीं जाता, एक युग चला जाता है। हाल ही में विश्वविख्यात उर्दू शायर बशीर बद्र के निधन के बाद जो दृश्य सामने आया, उसने केवल एक साहित्यकार की विदाई का प्रश्न नहीं उठाया, बल्कि भारतीय समाज की सांस्कृतिक चेतना पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विभिन्न समाचार रिपोर्टों के अनुसार उनका अंतिम संस्कार अत्यंत सीमित उपस्थिति में संपन्न हुआ, जबकि उनकी शायरी करोड़ों लोगों की स्मृतियों में जीवित है।
यह वही बशीर बद्र थे जिनके शेर केवल मुशायरों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि आम आदमी की बातचीत, प्रेम-पत्रों, राजनीतिक भाषणों, फिल्मों और सोशल मीडिया तक पहुँच गए। 

"उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।"
यह केवल एक शेर नहीं था, यह जीवन-दर्शन था।
"दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों।"
यह केवल कविता नहीं थी, यह सभ्यता की शिक्षा थी।
"लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।"
यह केवल दर्द नहीं था, यह इतिहास की चीख थी।
बशीर बद्र: केवल शायर नहीं, एक सांस्कृतिक संस्था
बशीर बद्र ने उर्दू शायरी को अभिजात्य दायरों से निकालकर आम जनता तक पहुँचाया। उनकी भाषा में कठिन फ़ारसी शब्दों का बोझ नहीं था, बल्कि जीवन का अनुभव था। यही कारण है कि उनके शेर भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में समान रूप से लोकप्रिय हुए। 

उन्होंने प्रेम लिखा, विरह लिखा, राजनीति लिखी, दंगे लिखे, इंसानियत लिखी और सबसे बढ़कर मनुष्य की आत्मा को लिखा।1987 के मेरठ दंगों में उनका घर और वर्षों की साहित्यिक पूँजी जल गई, लेकिन उन्होंने नफ़रत नहीं लिखी। उन्होंने प्रतिशोध नहीं लिखा। उन्होंने मनुष्यता लिखी। 

आज के विषाक्त सामाजिक वातावरण में यह बात और भी बड़ी हो जाती है। प्रश्न केवल अंतिम यात्रा का नहीं है
यदि सचमुच उनकी अंतिम यात्रा में बहुत कम लोग उपस्थित थे, तो यह केवल एक आयोजन की विफलता नहीं है। यह हमारी सामूहिक संवेदनहीनता का दस्तावेज़ है। यह प्रश्न उठता है कि जिस शहर ने उन्हें दशकों तक अपना साहित्यिक गौरव बताया, वहाँ के साहित्यकार कहाँ थे? वे पत्रकार कहाँ थे जो प्रतिदिन संस्कृति बचाने की बातें करते हैं? वे बुद्धिजीवी कहाँ थे जो लोकतंत्र और समाज पर लंबी-लंबी बहसें करते हैं?
वे राजनीतिक दल कहाँ थे जो हर अवसर पर विरासत और संस्कृति की दुहाई देते हैं? सच यह है कि हमारे समय में व्यक्ति की प्रतिष्ठा उसके जीवित विचारों से नहीं, उसकी उपयोगिता से तय होने लगी है। जब तक कोई व्यक्ति पुरस्कार दिला सकता है, मंच दिला सकता है, सत्ता से जोड़ सकता है, तब तक उसके चारों ओर भीड़ रहती है। जैसे ही वह बीमारी, वृद्धावस्था या असहायता का शिकार होता है, लोग धीरे-धीरे दूर हो जाते हैं।
बशीर बद्र वर्षों तक डिमेंशिया से जूझते रहे और सार्वजनिक जीवन से लगभग अलग हो गए थे। उनके परिवार ने भी बताया कि उन्होंने अपनी सर्वोच्च छवि को सुरक्षित रखने के लिए स्वयं को मुशायरों से दूर कर लिया था। 

लेकिन क्या किसी महान रचनाकार का सम्मान उसकी सक्रियता समाप्त होने के साथ समाप्त हो जाना चाहिए?
बुद्धिजीवी वर्ग का संकट किसी भी राष्ट्र का निर्माण केवल संसद नहीं करती, केवल उद्योगपति नहीं करते, केवल सेनाएँ नहीं करतीं। राष्ट्र की आत्मा उसके साहित्यकार, कलाकार, दार्शनिक और चिंतक गढ़ते हैं।
राजनीतिक स्वतंत्रता संविधान देता है, लेकिन मानसिक स्वतंत्रता साहित्य देता है। यदि किसी समाज में साहित्यकारों की मृत्यु पर सन्नाटा हो और फिल्मी विवादों पर तूफ़ान खड़ा हो जाए, तो समझ लेना चाहिए कि वह समाज मनोरंजन-प्रधान तो हो सकता है, संस्कृति-प्रधान नहीं। आज का सबसे बड़ा संकट यही है कि हम साहित्य को पढ़ते कम और उद्धृत अधिक करते हैं। हम शायरों के शेरों को सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हैं, लेकिन शायरों को भूल जाते हैं।
हम कविताओं से अपनी छवि चमकाते हैं, लेकिन कवियों के जीवन-संघर्ष से कोई सरोकार नहीं रखते।
क्या साहित्यिक चेतना मर रही है?
यह प्रश्न कठोर है, लेकिन आवश्यक भी।
यदि किसी विश्वस्तरीय शायर की विदाई पर समाज की उपस्थिति प्रतीकात्मक रह जाए, तो यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि साहित्यिक चेतना गंभीर संकट में है।
हालाँकि पूरी तरह मर जाना शायद सही शब्द नहीं होगा।
क्योंकि वही समाज आज भी बशीर बद्र के शेर साझा कर रहा है। वही समाज उनकी पंक्तियाँ याद कर रहा है।
समस्या यह है कि हमारी संवेदना अब प्रत्यक्ष सहभागिता की बजाय डिजिटल अभिव्यक्ति तक सीमित होती जा रही है। हम श्रद्धांजलि लिख देते हैं, लेकिन शोकसभा तक नहीं पहुँचते। हम पोस्ट साझा कर देते हैं, लेकिन कंधा देने नहीं जाते।
बशीर बद्र का असली सम्मान
बशीर बद्र को फूलों से अधिक ज़रूरत पाठकों की थी।
उन्हें सरकारी वक्तव्यों से अधिक ज़रूरत नई पीढ़ी के अध्ययन की थी।
उन्हें श्रद्धांजलि सभाओं से अधिक ज़रूरत इस बात की है कि उनके शेर आने वाली पीढ़ियों की चेतना का हिस्सा बनें। किसी महान शायर का सम्मान उसकी कब्र पर भीड़ इकट्ठी कर देने से नहीं होता।
सम्मान तब होता है जब समाज उसके विचारों को जीवित रखता है। फिर भी, एक सभ्य समाज अपने महान रचनाकारों को अंतिम विदाई के समय अकेला नहीं छोड़ता। यदि वास्तव में ऐसा हुआ है, तो यह केवल बशीर बद्र की नहीं, हमारी सामूहिक असफलता है।
क्योंकि इतिहास में यह दर्ज नहीं होगा कि अंतिम यात्रा में कितने लोग थे। इतिहास यह दर्ज करेगा कि करोड़ों लोगों की ज़ुबान पर रहने वाला शायर जब विदा हुआ, तब समाज अपनी संवेदनाओं की परीक्षा में कितना सफल या असफल रहा।
और शायद इस पूरे प्रसंग पर सबसे सटीक टिप्पणी स्वयं बशीर बद्र बहुत पहले कर चुके थे—
"ये मतलबों के सलाम थे, यही सोचकर मैं चुप रहा,
जब कोई नहीं था पास में, तो कोई नहीं था दूर भी।"
बशीर बद्र चले गए, लेकिन उनकी शायरी अभी भी हमारे समय का आईना है। प्रश्न यह नहीं कि हमने उन्हें कितना पढ़ा; प्रश्न यह है कि क्या हमने उनसे कुछ सीखा भी!
लेखक हृदयानंद मिश्र, एडवोकेट एवं सदस्य हिन्दू धार्मिक न्यास बोर्ड झारखंड सरकार।

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