शब्द, मंच, कैमरा और समाज के बीच एक संवेदनशील यात्री…
आज जब कला का एक बड़ा हिस्सा बाजार, प्रचार और तात्कालिक लोकप्रियता की भेंट चढ़ता जा रहा है, ऐसे दौर में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो कला को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज और मनुष्य की आत्मा से संवाद का माध्यम मानते हैं।
ऐसे ही सृजनधर्मी व्यक्तित्व हैं सैकत चट्टोपाध्याय — जिनकी रचनात्मक यात्रा मंच, साहित्य, पत्रकारिता, फोटोग्राफी और सिनेमा तक फैली हुई है।
सैकत चट्टोपाध्याय केवल एक नाम नहीं, बल्कि संवेदनाओं के उस संसार के शिल्पकार हैं, जहां आम आदमी की पीड़ा, टूटते रिश्तों की खामोशी और समाज की अनकही बेचैनियां जीवंत हो उठती हैं।
वे उन कलाकारों में हैं जो तालियों से ज्यादा दर्शकों की आंखों में उतरने वाली नमी को अपनी सफलता मानते हैं।
उनका आगामी नाटक “फिर मिलेंगे”, प्रसिद्ध बंगला नाटककार चंदन सेन के चर्चित बंगला नाटक “दायबद्ध” पर आधारित है। यह केवल एक रंगमंचीय प्रस्तुति नहीं, बल्कि टूटते रिश्तों, बिखरती संवेदनाओं और इंसानी अकेलेपन की ऐसी दास्तां है, जो आधुनिक समाज के भीतर गहरे उतरती है।
एक ट्रक ड्राइवर की खामोश जिंदगी के बहाने यह नाटक उस समाज का आईना बन जाता है, जहां लोग साथ रहते हुए भी भीतर से दूर हो चुके हैं।
रिश्ते अब शब्दों से नहीं, सुविधाओं से तय होने लगे हैं।
ऐसे समय में “फिर मिलेंगे” जैसे नाटक दर्शकों को अपने भीतर झांकने के लिए मजबूर करते हैं।
सैकत चट्टोपाध्याय की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वे कला को जमीन से जोड़ते हैं।
उनकी लेखनी में कृत्रिम चमक नहीं, बल्कि जीवन की सच्ची धूल और पसीने की गंध मिलती है।
वे मंच पर पात्र नहीं गढ़ते, बल्कि समाज के वास्तविक चेहरे सामने रखते हैं।
एक लेखक के रूप में उनकी भाषा भावनात्मक होने के साथ-साथ वैचारिक गहराई से भी भरी होती है।
एक निर्देशक के रूप में वे दृश्य नहीं, वातावरण रचते हैं।
एक अभिनेता के रूप में वे अभिनय नहीं करते, बल्कि पात्र को जीते हैं।
और एक फोटोग्राफर एवं पत्रकार के रूप में उनकी दृष्टि समाज की उन परतों तक पहुंचती है, जिन्हें अक्सर मुख्यधारा नजरअंदाज कर देती है।
इतना ही नहीं, सैकत चट्टोपाध्याय ने कई फिल्मों के निर्माण में भी अपनी सृजनात्मक पहचान छोड़ी है।
उनकी सिनेमाई सोच व्यावसायिक शोर से अलग, मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक यथार्थ की जमीन पर खड़ी दिखाई देती है।
वे उन विरले रचनाकारों में हैं जो माध्यम बदलते हैं, लेकिन अपनी आत्मा नहीं।
आज जब कला का बड़ा हिस्सा त्वरित प्रसिद्धि की दौड़ में खो रहा है, सैकत चट्टोपाध्याय जैसे कलाकार यह याद दिलाते हैं कि सच्चा कलाकार वही होता है जो समाज के दर्द को अपनी रचना का विषय बनाए और इंसानियत को अपनी कला का केंद्र।
गेटी थियेटर में होने जा रहा “फिर मिलेंगे” केवल एक नाटक नहीं होगा, बल्कि संवेदनाओं का वह मंच बनेगा जहां दर्शक शायद अपने टूटे रिश्तों, खोई हुई यादों और अधूरी बातों से फिर मुलाकात करेंगे।
ऐसे समय में जब समाज संवादहीनता के संकट से गुजर रहा है, सैकत चट्टोपाध्याय जैसे कलाकार उम्मीद की तरह दिखाई देते हैं।
वे यह विश्वास जगाते हैं कि कला अभी मरी नहीं है…
संवेदनाएं अभी बची हुई हैं…
और इंसान अब भी इंसान से “फिर मिल” सकता है।
— हृदयानंद मिश्र
एडवोकेट एवं सदस्य,
हिन्दू धार्मिक न्यास बोर्ड
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